छत्तीसगढ़ राज्य के विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा की पहचान एवं संरक्षण का एक नृजातीय अध्ययन

 

चम्पा साहू1, डॉ.रश्मि कुजूर2 , डॉ.निस्तर कुजूर3

1शोधार्थी, समाजशास्त्र एवं समाजकार्य अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर.

2सहायक प्राध्यापक, शा. पं. श्यामाचरण शुक्ल महाविद्यालय, धरसीवा, रायपुर.

3प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, समाजशास्त्र एवं समाजकार्य अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर.

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

आदिकाल से जनजाति संस्कृति का भारत की सांस्कृतिक पहचान में  विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण स्थान रहा है किसी भी जनजाति की पहचान मुख्यता उसकी संस्कृति से होती है | जिसमें उनका खान-पान रहन-सहन, वेश-भूषा,भाषा-बोली,कहावते,लोकगीत एवं लोकनृत्य आदि समाहित  है | छत्तीसगढ़ में पाई जाने वाली विभिन्न जनजातियों में बैगा जनजाति एक विशेष पिछड़ी जनजाति है जिनकी पहचान उनकी अपनी आदिवासी संस्कृति रही है | बैगा आदिवासी की पहचान का प्रमुख आधार पुरुषो में सावला रंग गठिला शरीर और उसके लम्बे बाल तथा महिलाओ में उनकी परम्परागत वी आकार का चूल्हा गोदना प्रमुख हैइसके साथ ही बैगा जनजाति की पहचान में उनके द्वारा की जाने वाली कृषि ,करमा नृत्य,बिल्मा नृत्य,ददरिया गीत,विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान,तीज-त्यौहार,चिकित्सकीय प्रणाली,शिकार पद्धति आदि भी उनके पहचान का प्रमुख आधार है ,जो वर्तमान समय में आधुनिकता और बाहय हस्तक्षेप के कारण विलुप्त होते जा रहें हैजिसे बैगा जनजाति की अस्मिता एवं पहचान हेतु संरक्षण की अति आवश्यक है

 

शब्द कुंजी :- बैगा जनजाति, जनजाति अस्मिता, पहचान एवं संरक्षण

 

 

INTRODUCTION:

बैगा जनजाति:- भारत सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य के 43 जनजातिय समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में चिन्हाकित किया गया है जो 161 उपजातियो में विभक्त है | 43 जनजातिय समुदाय में से 5 जनजातिय समुदाय को भारत सरकार द्वारा विशेष मानदण्ड कम स्थिर जनसंख्या, आदिम कृषि पद्धति, न्यून साक्षरता दर, आर्थिक पिछड़ेपन आदि के आधार पर विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा दिया गया है जिसमें बिरहोर,पहाड़ कोरवा, अबुझमाड़, एवं बैगा जनजाति शामिल है | बैगा जनजाति एक विशेष पिछड़ी जनजाति है जिनकी पहचान उनकी अपनी आदिवासी संस्कृति रही है | बैगा आदिवासी की पहचान का प्रमुख आधार पुरुषो में सावला रंग गठिला शरीर और उसके लम्बे बाल तथा महिलाओ में उनकी परम्परागत वी आकार का चूल्हा गोदना प्रमुख है | जनगणना 2011 के अनुसार छत्तीसगढ़ में कुल अनुसूचित जनजातियों की संख्या 78,22,902 है जिसमें बैगा जनजाति की कुल आबादी 89,744 है | जिसमें पुरुषो की संख्या 44,847 एवं महिलाओ की जनसंख्या 44,897 है | बैगा जनजाति में कुल साक्षारता दर 32.17 प्रतिशत है जिसमें पुरुषो की साक्षारता दर 40.01 प्रतिशत एवं महिलाओ की साक्षरता दर 24.34 प्रतिशत है जो पुरुषो की तुलना में बहुत कम है बैगा जनजाति में लिंगानुपात 1001 है | रसेल एवं हीरा लाल(1916)1 ने अपने अध्ययन में बैगा जनजाति के अनेक उपसमूहों भतोरिया, बिंझवार, गोडवानिया, ख़तभानिया, कोंधि, नरोतिया, नहार या रायबनिया और ; गोत्र समूह घुघरिया, लेपिया, मरकाम, मरावी, नेताम एवं टेकाम का उल्लेख किया है |

 

एल्विन (1939)2  ने बैगा जनजाति को मेडिसिन मेन कहा है जो जड़ी -बूटी का अधिक ज्ञान रखते है और अपने स्वास्थ्यगत समस्याओ का उपचार जड़ी-बूटी के माध्यम से करते है | साथ ही इन्होंने बैगा जनजाति के वंश,गोत्र समूह उत्पत्ति एवं सम्पूर्ण जीवन शैली का गहन अध्ययन कर बताया की सबसे पहले बैगा जनजाति छत्तीसगढ़ में छोटा नागपुर के रास्ते से प्रवेश किया था | जो वर्त्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य के विभिन्न 6 जिलो कबीरधाम, बिलासपुर, राजनांदगांव, कोरिया, मुंगेली, और गौरेला पेंड्रा मारवाही के 10 विकासखंड बोडला, पंडरिया, कोटा, तखतपुर, गौरेला, छुईखदान, लोरमी, मनेद्रगढ़, खण्डगवा एवं भरतपुर क्षेत्रों में निवास करते हैं | बैगा जनजाति आधुनिकता से दूर दुर्गम स्थनों जंगलो पहाड़ो में निवास करती है जो संस्कृतिक रूप से समृद्ध मानी जाती है जिनकी जीवन शैली संस्कार, कला ,परम्परा एवं पर्व और त्यौहारों नीति नियम आदि अलग विशिष्ट होते हैं | जो बैगा जनजाति को एक अलग पहचान दिलाती है | बैगा जनजाति की संस्कृति परम्परागत एवं प्राचीन है | चौरसिया,विजय कुमार (2009)3 बैगा जनजाति को प्राकृतिक पुत्र कहा है क्योंकि बैगा जनजाति प्राकृतिक के बहुत करीब होते हैं तथा पृथ्वी को अपनी माँ कहते हैं , और पृथ्वी पर हल नहीं चलाते हैं,क्योंकि इनकी मान्यता है की हम अपनी माँ के सीने पर हल नहीं चलाते हैं , इसके साथ ही बैगा जनजाति प्राकृतिक औषधियों जड़ीबूटियों के बारे में अधिक जानकारी रखते हैं | बैगा जनजाति के लोग अपने स्वास्थ्य से सम्बंधित समस्यों का उपचार जड़ीबूटियों एवं झाड़फुक से करते हैं तथा बैगा जनजाति द्रविण जनजाति परिवार का एक समूह है | दत्त हरिनारायण एवं बाजवा जसप्रीत (2017)4  ने बैगा जनजाति को मध्य-प्रदेश का मुल निवासी कहा है जो झाड़-फुक द्वारा बीमारी का इलाज करने की पम्परा रही है इसलिए इन्हें ओझा या गुनिया के नाम से भी जाना जाता है | प्रस्तुत अध्ययन छत्तीसगढ़ राज्य के विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा की पहचान एवं संरक्षण का एक नृजातीय अध्ययन पर आधारित है इसके अध्ययन क्षेत्र हेतु छत्तीसगढ़ राज्य के बैगा जनजाति निवासरत कबीरधाम जिला एवं ज़िले के बोडला विकासखंड का चयन उद्देश्य पूर्ण निदर्शन के माध्यम से किया गया है | बोडला विकासखंड के दो गाव बोदलपानी और सोनवाही का चयन क्रमशः दुरी को आधार मानकर किया गया है जिसमें बोडला से बोदलपानी की दुरी 30 किलोमीटर के अन्दर एवं सोनवाही की दुरी 50 किलोमीटर के अन्दर है |

 

शोध अध्ययनों की समीक्षा :-

भागवत डी. (1957)5  ने करमा में करमा अनुष्ठान, नृत्य,गीत के साथ करमा नृत्य के विभिन्न रूपों का वर्णन किया है जिसमें इन्होंने करमा को गोंड संस्कृति का स्वदेशी हिस्सा नहीं माना है बल्कि कोलारियान या मुंडा संस्कृति का उत्पाद माना है | इन्होंने अपने अध्ययन में स्पष्ट किया है की बैगा,मझवार और सावर वे लोग है जो मुख्य रूप से करमा का अभ्यास करते है और बाकि जनजातियों ने उनकी नकल की है, इसके साथ ही यह भी कहा है की करमा नृत्य केवल बिलासपुर कि जनजातियों द्वारा मनाया जाता है जिसे पूर्वी अनुष्ठानों के साथ मिला दिया गया हैयह नृत्य पुरे प्रान्त एवं हिन्दुओं में बहुत ही लोगप्रिय है जिसे गोलाकार प्रदर्शन की तकनीक के आकार में भिन्न-भिन्न चरण में प्रदर्शन करते हैं |

 

भागवत डी. (1968)6 ने जनजाति त्यौहार का उल्लेख करते हुए कहा की जनजातियां त्योहारों के लिए उतने ही शौक़ीन है जितनी हम है फिर भी वे हमसे कहीं अधिक बेहतर त्योहारों के बारे में जानते हैं कि उनका आनंद कैसे लेना है | जनजातियों में त्यौहार के  अवसरों पर मदिरा अपरिहार्य है |वहां रात भर नाच-गाना चलता रहता है और स्त्रीपुरुष व्यवहार प्राय:असंमित रहता है जहाँ इनके त्योहारों का हिस्सा अश्लील इशारे और अश्लील गाने भी होते हैं | इनके कई अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों जैसे विवाह, अत्येष्टि संस्कारों ,फसल उत्सव फाग और सुअर बलि आदि में ऐसे औपचारिक दुरुपयोग अपरिहार्य है | इसके साथ ही साथ जनजाति अपने समारोहों एवं त्यौहार में अपने कुल देवी-देवताओं को रक्त और शराब अर्पित करते है ,सभी जनजाति अपने इष्ट देवताओं को सुअर,बकरे,मुर्गी आदि चढ़ाते है |

 

कॉफमन,वाल्टेयर (1941)7 फोकसौंग ऑफ़ गोंड एंड बैगा. म्यूजिकल क्व़ारटार्ली  में बैगा जनजाति को मध्य भारत की जनजाति बताया है जिसका निवास स्थान सतपुड़ा पर्वत के पूर्वी छोर मैकाल श्रेणी है बैगा जनजाति देश के मुल निवासी है जो आक्रमणकारियों के भय के कारण पहाड़ो एवं जंगलो में शरण ले लिया | वर्तमान में  बैगा जनजाति अपनी सभी प्राचीन आदतों को बरकरार रखते हुए हिन्दू धर्म को अपना लिया  है लेकिन अपनी प्राचीन रीति-रिवाजों को संरक्षित रखे हुए है |  

 

मोहंती पी.के.( 2004)8 ने एनसाइक्लोपीडिया ऑफ प्रिमिटिव ट्राइब इन इंडिया में बैगा जनजाति का विस्तृत विवरण जनसंख्या के आधार पर किया है जिसमें उन्होंने बैगा जनजाति की संस्कृति के विभिन्न पहलुओं भाषा, विश्वास, परंपरागत व्यवसाय, भोजन एवं परिवार का अध्ययन कर बैगा जनजाति को निम्नतम साक्षरता दर वाली जनजाति के रूप में स्पष्ट किया है

 

सबेस्टियन लेकरा (2020)9 ने अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी के संबंध में बैगा जनजाति का स्वदेशी ज्ञान और प्रथाएं का अध्ययन कबीरधाम जिला में किया है जिसमें उन्होंने बताया है कि स्वदेशी ज्ञान के माध्यम से प्राकृतिक वातावरण का अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है और बदलते परिस्थितियों में समायोजन और अनुकूलन में सहायक होते हैं।

 

बैगा परमात्मा राम (2022)10 ने मैकांचल क्षेत की बैगा संस्कृति का नृ:पुरातात्वि अध्ययन किया है जिसमें इन्होने बैगा जनजाति के सांस्कृतिक पहलुओ के अपने अध्ययन के आधार पर स्पस्ट किया है की  बैगा जनजाति में गोत्रो का विभाजन देवोपसना और देवगुड़ी के आधार पर हुआ है एवं  बैगा जनजाति के लोग विभिन्न संस्कारो जैसे जन्म, विवाह, मृत्यु संस्कारो को संपन्न करते हैं जो  शास्त्र विहीन है |

 

पाटीदार (2023)11 के अध्ययन से परंपरागत चिकित्सा विभिन्न संस्कृतियों के स्वदेशी सिद्धांतों विश्वासों और अनुभव पर आधारित ज्ञान है जिसका उपयोग  सम्मिलित रूप से प्राचीन समय से बैगा जनजाति द्वारा किया जाता है बैगा जनजाति समुदाय का परंपरागत ज्ञान जंगलों से प्राप्त विभिन्न प्रकार के जड़ी बूटियों एवम् वनस्पति पर आधारित है, बैगा जनजाति के लोग जड़ी बूटियों से संबंधित जानकारी रखते है और इस ज्ञान का उपयोग वे स्वास्थ्य देखभाल के साथ विभिन्न प्रकार के शारीरिक और मानसिक बीमारी की निदान एवं उपचार में करते हैं

 

दास निकिता (2024)12 बैगा जनजाति के बीच स्वदेशी ज्ञान और प्रचलित प्रथाओ का अध्ययन में बैगा जनजाति के परम्परागत ज्ञान के अंतर्गत बैगा जनजाति के स्वास्थ्य देखभाल,निदान और उपचार,परम्परागत कृषि सम्बंधित ज्ञान,बीजो की बोवाई एवं संरक्षण सम्बंधित ज्ञान आदि का विस्तृत जानकारी दिया है जिसमें इन्होंने बताया है की बैगा जनजाति विभिन्न बीमारीयों का कारण सांस्कृतिक और प्राकृतिक है | बीमारियों को लेकर बैगा जनजाति में सांस्कृतिक मान्यताए अध्यात्मिक,अलौकिक और जादुई -धार्मिक मान्यताओ से जुड़े होते है

 

अध्ययन पद्धति :- प्रस्तुत अध्ययन छत्तीसगढ़ राज्य के विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा की पहचान एवं संरक्षण का एक नृजातीय अध्ययन पर आधारित है |जिसके अध्ययन पद्धति को तीन भागो विभक्त किया गया है |

1.उतरदाताओं का चुनाव :- अध्ययन हेतु चयनित दोनों गाँव बोदलपानी और सोनवाही में कुल 212 परिवार की कुल जनसंख्या है जिसमें से अध्ययन हेतु 148 परिवारों का चयन दैव निदर्शन की लाटरी प्रणाली से किया गया है | चयनित परिवार के मुखिया को अध्ययन इकाई के रूप में लिया गया है |

 

2.तथ्य संकलन की प्रविधि ;- प्रस्तुत शोध अध्ययन हेतु चयनित उतरदाताओं से प्राथमिक तथ्यो का संकलन साक्षात्कार-निर्देशिका, साक्षात्कार-अनुसूची ,समूह वार्ता तथा अवलोकन प्राविधि के द्वारा किया जाएगा तथा आवश्यकतानुसार द्वितीयक तथ्यों का संकलन हेतु पूर्व में किये गये शोध अध्ययन,इन्टरनेट, शोध पत्र-पत्रिकाए आदि का प्रयोग किया गया है |

 

3.शोध प्ररचन :- प्रस्तुत अध्ययन छत्तीसगढ़ राज्य के विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा की पहचान एवं संरक्षण का एक नृजातीय अध्ययन शीर्षक पर आधारित है | जिसमें बैगा जनजाति की परम्परागत  पहचान से जुडी विभिन्न सांस्कृतिक पहलूओं का अध्ययन उसके वास्तविक रूप में कर बैगा जनजाति की पहचान को संरक्षित करने का प्रयास किया गया है प्रस्तुत शोध अध्ययन हेतु वर्णात्मक शोध प्ररचना का प्रयोग किया जायेगा जो पूर्णत:गुणात्मक अध्ययन पद्धति के अंतर्गत नृजातीय अध्ययन पद्धति पर आधारित है |

 

बैगा जनजाति की पहचान एवं संरक्षण :-

बैगा जनजाति की पहचान जनजाति अस्मिता एवं संरक्षण वर्तमान समय में एक चुनौती है | विभिन्न जनजाति समुदाय आधुनिकता एवं चकाचौंध की दौर में अपनी अस्मिता खोते जा रहे है जनजाति अस्मिता से आशय जनजाति समूह की सामूहिक पहचान से है ,जिसमें जनजातियों की विशिष्ट संस्कृति,भाषा,रीति-रिवाज जीवन शैली सामूहिक स्मृति और परम्परागत रूप से चली रही उनकी परम्पराए शामिल होती है | जो विभिन्न जनजातिय समुदाय को एक विशिष्ट पहचान दिलाने के साथ साथ उन्हें अन्य समुदायों से अलग करती है | भारत सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य के 43 जनजातिय समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में चिन्हाकित किया गया है जो 161 उपजातियो में विभक्त है | 43 जनजातिय समुदाय में से 5 जनजातिय समुदाय को भारत सरकार द्वारा विशेष मानदण्ड कम स्थिर जनसंख्या,आदिम कृषि पद्धति,न्यून साक्षरता दर,आर्थिक पिछड़ेपन आदि के आधार पर विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा दिया गया है जिसमें बिरहोर,पहाड़ कोरवा,अबुझमाड़,एवं बैगा जनजाति शामिल है | बैगा जनजाति एक विशेष पिछड़ी जनजाति है जिनकी पहचान उनकी अपनी आदिवासी संस्कृति रही है | बैगा आदिवासी की पहचान का प्रमुख आधार पुरुषो में सावला रंग गठिला शरीर और उसके लम्बे बाल तथा महिलाओ में उनकी परम्परागत वी आकार का चूल्हा गोदना प्रमुख हैइसके साथ ही बैगा जनजाति की पहचान में उनके द्वारा की जाने वाली कृषि, करमा नृत्य, बिल्मा नृत्य, ददरिया गीत, विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, तीज-त्यौहार, चिकित्सकीय प्रणाली, शिकार पद्धति आदि भी उनके पहचान का प्रमुख आधार है ,जो वर्तमान समय में आधुनिकता और बाहय हस्तक्षेप के कारण विलुप्त होते जा रहें हैजिसे बैगा जनजाति की अस्मिता एवं पहचान हेतु संरक्षण की अति आवश्यक है |

 

बैगा जनजाति की पहचान का प्रमुख आधार :- बैगा जनजाति की पहचान अपने समुदाय की व्यक्ति एवं समूहों के बीच संबंधो और सामाजिक संरचनाओं के माध्यम से निर्मित एक जटिल एवं बहुस्तरीय अवधारणा है | जो व्यक्तियों के विचार की विशिष्ट विशेषताओं, वस्तु, गुणों,या लक्षणों के आधार पर निर्मित हुआ है जिसके आधार पर परम्परागत रूप से बैगा जनजाति को पहचाना जाता रहा है | बैगा जनजाति की पहचान का प्रमुख आधार उनकी जीवन शैली के साथ उनमें प्रचलित सांस्कृतिक विशेषताए खान-पान, रीति-रिवाज, भाषा गोदना परम्परा, परम्परागत चिकित्सा पद्धति, परम्परागत नृत्य संगीत जैसे करमा, बिल्मा रीना झरपट एवं तीज-त्यौहार प्रमुख है |

 

1.भोजन व्यवस्था :- बैगा जनजाति का परम्परागत भोज्य पदार्थ कोदो,कुटकी एवं मक्के का पेज रहा है जो बहुत ही पौष्टिक रहा है | बैगा जनजाति के भोजन का प्रमुख हिस्सा मोटे अनाज ,जंगलो से प्राप्त विभिन्न भाजी (जैसे चरोटा,कोइलर,चेज),वनों से प्राप्त कंद-मुल,फल-फुल के साथ शिकार से प्राप्त छोटे बड़े जीव-जंतु का मांस रहा है जो वर्तमान समय में विलुप्त होने के कगार में है वर्तमान समय में इनका भोजन का प्रमुख आधार मोटे अनाज के स्थान पर चावल हो गया है जो पहले कभी अचानक बनता था |  

 

2.गोदना परम्परा :-गोदना परम्परा बैगा जनजाति की पहचान का प्रमुख साधन रहा है | V आकार की चूल्हा गोदना बैगा महिलाओं की पहचान रही है 10 -12 वर्ष की उम्र में बैगा महिलओं के माथे पर बनाया जाता था जो बैगा होने के प्रतीक या सांस्कृतिक पहचान थी इसके साथ ही गोदना स्थायी श्रृंगार एवं गरीब की गहन के रूप में बैगा जनजाति के लोग अधिक मात्रा में गुदवाते थे और गोदना को एक्युप्रेशर या विभिन्न बीमारियों की निदान में टोटका के रूप में स्वीकार करते थे रसेल (1916) ने अपने अध्ययन में स्पष्ट किया है कि बैगा जनजाति शारीरिक श्रृंगार के रूप गोदना बनवाती है लड़कियों में आमतौर पर पांच साल की उम्र में अपने माथे पर गोदना बनवाते है। बैगा जनजाति में गोदना को लेकर विश्वास है कि गोदना शरीर की रक्षा करते है और विभिन्न बीमारियों को दूर करते हैं। गोदना परंपरा बैगा जनजाति में वर्तमान समय में पूरी तरह से विलुप्त होने के कगार पर है और आज के युवक युवती परम्परागत गोदना से दूर हो गये है | एल्विन ने बैगा जनजाति में गोदना को यौन उतजेक का आधार माना है |

 

3.भाष :- बैगा जनजाति की परम्परागत जनजातिय भाषा बैगानी है |भाषा किसी भी समुदाय की आत्मा होती है जिसके माध्यम से उस समुदाय के लोग अपने विचारों का आदान-प्रदान सहजता पूर्वक करते है | बैगानी भाषा के स्थान पर वर्तमान में बैगा जनजाति छत्तीसगढ़ी भाषा के साथ अन्य स्थानीय भाषा का प्रयोग करते जा रहे है वर्त्तमान पीढ़ी बैगानी भाषा से दूर हो रहे है जिसमें आधुनिक शिक्षा पद्धति,आधुनिकता एवं अन्य बाहरी समुदाय से संपर्क प्रमुख कारण है |

 

4.परम्परागत चिकित्सा पद्धति :- बैगा जनजाति के लोग प्रकृति से प्राप्त विभिन जड़ी-बूटियों के माध्यम से अपने स्वास्थ्यगत समस्याओं का उपचार एवं निदान करते रहें हैं | एक कुशल प्रशिक्षित  बैद्य के रूप में इनकी पहचान रही है  इसलिए एल्विन ने इन्हें मेडिसिन मेन कहा है |वर्तमान समय में बैगा जनजाति के लोग अपने परम्परागत जड़ी-बूटी से सम्बंधित ज्ञान से दुर होते जा रहे है |

 

5.परम्परागत नृत्य :- बैगा जनजाति समुदाय द्वारा परम्परागतरूप से विभिन्न गीतों एवं नृत्यों का आयोजन विभिन्न धार्मिक उत्सवों एवं संस्कारो में होता रहा है जिसमें करमा,बिल्मा,ददरिया,झरपट दशहरा आदि प्रमुख नृत्य  है | बैगा जनजाति में नृत्य की शुरुआत दशहरा के समय खैर माई में फुल चढाने के बाद प्रारम्भ होती है और इसी दिन से बैगा जनजाति में करमा नृत्य का प्राम्भ होता है | करमा नृत्य बैगा जनजाति की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर के साथ समृद्ध संस्कृति को प्रदर्शित करती है जो सामाजिक एकता एवं सामूहिकता का प्रतीक है जिसे महिला एवं पुरुष परम्परागत वाद्य यंत्रो जैसे ठिसकी,ढोल,मंदार,तथा परम्परागत पोशाक में साज-श्रृंगार के साथ गोलकार में घूम-घूम कर करते है | बिल्मा नृत्य भी बैगा जनजाति की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसका आयोजन विवाह संस्कार में लड़की के बिदाई के दौरान महिला एवं पुरुषों द्वारा गोल घेरा बना कर किया जाता है | ये नृत्य से युवा पीढ़ी दूर हो रही है अब विवाह,बारसा आदि में ये आधुनिक वाद्य यंत्रो का उपयोग करने लगे है |

 

6.तीज-त्योहार:- बैगा जनजाति द्वारा विभिन्न तीज-त्योहारों का आयोजन विभिन्न अवसरों में प्राकृतिक अपने इष्ट देवी-देवताओं एवं पूर्वजो का धन्यवाद ज्ञापन हेतु करते रहे है जिसमें बिदरी, भांचादान, आठ साल नौ कार्तिक, जावरा पर्व, नवाखाई, छेरता, फाग आदि प्रमुख तीज-त्योहार है जिनका आयोजन बैगा जनजाति परम्परागत रूप से करते रहे है | वर्तमान समय में बैगा जनजाति के लोग अपने तीज त्यौहार में बाहय लोगो के रीति-रिवाजो को सम्मिलित करते हुए उनके तीज-त्योहारों को अपना रहें है जो बैगा जनजाति की अस्मिता एवं पहचान के लिए एक संकट की स्थिति उत्पन्न कर रही है |

 

निष्कर्ष:- बैगा जनजाति का परम्परागत पहचान एवं संरक्षण एक अति महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील कार्य है जिससे  हम उनकी सांस्कृतिक विरासत को बचाने में सफल होंगे बल्कि इसके साथ हम बैगा जनजाति से संबंधित सांस्कृतिक विविधता और मानवता मूल्यों को भी सहेज कर संरक्षित रख सकते है | बैगा जनजाति की अस्मिता एवं पहचान उनकी परम्परागत जीवनशैली, परम्पराओ, सांस्कृतिक एवं धार्मिक  विश्वास, रीति-रिवाजो, परम्परागत नृत्य गीतों से सम्बंधित है जो वर्तमान में आधुनिकनता एवं बाहय समुदाय के संपर्क के कारण विलुत होते जा रहे है। एल्विन ने  अपने अध्ययन में बैगा जनजाति के ज्ञान और उनकी अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य देखभाल सांस्कृतिक प्रथाओं, लोकगीतों और संगीत मनोरंजन की कलाओं और प्रेम के संबंध में प्रथाओं में कमी देखने की बात स्पष्ट की है जो बैगा जनजाति की पहचान एवं अस्मिता हेतु संकट की स्थिति उत्पन्न कर रहे है |

 

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Received on 21.12.2025      Revised on 30.01.2026

Accepted on 24.02.2026      Published on 20.03.2026

Available online from March 23, 2026

Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2026; 14(1):53-58.

DOI: 10.52711/2454-2687.2026.00009

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